धार्मिक: मुसलमानों पर पांच वक्त की नमाज़ फ़र्ज़ है। और वही नमाज़ जमाअत से पढ़ने के लिए व दीन की शिक्षा देने के लिए किसी इमाम की ज़रूरत पड़ती है। तन्हा (अकेला) नमाज़ पढ़ने के मुक़ाबले में जमाअत का सवाब 27 गुना ज़्यादा है। यानि जिसने जमाअत से नमाज़ अदा किया उसने अकेले पढ़ने वाले से 27 गुना ज़्यादा सवाब पाया। इमामों का मर्तबा भी बहुत ऊंचा है, ये मिसाल काफ़ी है कि इमाम के आगे सिर्फ मुर्दा ही रहता है, जो ज़िन्दा रहता है वो इमाम के पीछे ही रहता है, इमाम की पैरवी करता है। इमामों को बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है व बड़ी मुश्किल से वक्त गुज़रता है।
जाहिलों की नजर में ऐसा इमाम चाहिए:
1- कपड़ा सफेद पहनता हो,
2- ख़ूब नेक मुत्तक़ी व परहेज़गार हो,
3- 24 घंटे मस्जिद में मौजूद रहे,
4- वक्त का एकदम पाबंद रहे,
5- नमाज़ में एक मिनट भी लेट न हो,
6- जनाज़ा भी पढ़ाए,
7- निकाह भी पढ़ाए,
8- कान में आज़ान भी दे,
9- फातिहा़ भी पढ़ें,
10- मीलाद भी पढ़ें,
11- बीमारों कि एयादत भी करे,
12- मस्जिद की सफाई भी करे,
13- मस्जिद में आज़ान भी दे,
14- मस्जिद/मदरसा से बाहर न निकले,
15- दुसरा कोई बिज़नेस/कारोबार न करे,
16- स्कूल या ट्यूशन भी न पढ़ाए,
17- हर आदमी की घटीया/अश्लील बातों को सुनता रहे,
18- अवाम के कुछ भी कहने पर कोई जवाब न दे,
19- अपनी जाएज़ ज़रुरियात के लिए भी कमेटी से इजाज़त ले,
20- सबकी बातें सिर्फ सुनें, जवाब न दें,
21- सबको ख़ुश रखे,
22- सब इल्ज़ाम/तोहमत को सहे,
23- एक बुलावे पर रात की नींद छोड़ कर हाज़िर हो जाए,
24- ज़रुरत के वक्त भी घर न जाएं,
25- दुसरे जगह प्रोग्राम भी न करें,
26- अवाम के मुताबिक़ इमाम रहे,
27- अवाम जो भी करे – नाच, गाना, बजाना, अय्याशी, हरामखोरी, चुग़लखो़री, बुराई वग़ैरह सब को सही कहे,
28- इमाम न समझाए, अवाम इमाम को समझाए,
29- ख़ेताब में सिर्फ जाहिल अवाम की चापलोसी करे,
30- अवाम के बुरे करतूतों को भी सही कहे,
31- जो शख्स (नामर्द) अपने बहन, बीवी, बच्चों को कंट्रोल न कर सके वो भी इमाम को कंट्रोल करे,
32- जिसकी बात बीवी, बच्चे, बहन कोई नहीं सुनता वो भी इमाम को सुनाए,
33- जो अपने औरतों की ग़ुलामी करता है वो भी इमाम पर रोब जमाए,
34- जिसको ग़ुस्ल, वज़ू , नमाज़, जनाज़ा की तरकीब नहीं मालूम वो भी इमाम को तरीक़ा बताए,
35- जो अपने बीवी, बच्चों की हरकतों पर नज़र न रख सके वो भी इमाम पर पुख्ता नज़र रखे,
36- जिसको क़ुरआन के क़ाफ का मख़रज नहीं मालूम वो भी इमाम को पढ़ाना सिखाए,
37- जो नामर्द बीवी के सामने नहीं बोलते वो भी इमाम से उंची आवाज़ में बात करे,
38- जो अपने बहन, बीवी, बेटी को घर से बाहर जाने से न रोक सके वो भी इमाम को रोके,
39- जो जानवरों के तरह (खड़ा हो कर) खाने, पीने, पहनने, रहने का आदी हो वो भी इमाम में ऐब निकाले,
40- इमाम की सब्र/परहेज़ करने को डर या कमज़ोरी समझे,
41- जिसको कलमा भी पढ़ना न आता हो वो इमाम को पढ़ाने की तरकीब बताए,
42- जिसको सोने, उठने, बैठने, बोलने, रहने की तमीज़ न हो वो भी इमाम को तमीज़ सिखाए,
43- जिसकी बात बहन, बीवी, बच्चे भी नहीं मानते वो अपनी बात इमाम से मनवाए,
44- जो बेहयाई व बेशर्मी से कुछ भी बोले वो इमाम के बोलने पर आपत्ति जताए,
45- इमाम अपने घर, रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त व अहबाब सबको भूल जाए,
46- जो अपने बहन, बीवियों, बेटियों व लावारिश औलादों को न समझा सके वो मदरसा के बच्चों को समझाए,
47- जो भीख (जहेज़ वग़ैरह) मांगता हो वो इमाम को नज़राना तलब करने पर सुझाव दे,
48- आजकल उर्दू के साथ हिंदी, अंग्रेजी़ एकदम ज़रूरी है लेकिन बेग़ैरत, बेज़मीर, बेहुदा, बेशर्म लोग हिंदी, अंग्रेजी़ पर भी आपत्ति जताए,
49- इमाम को ग़ुलाम समझे और अगर इमाम बाईक, कार से चलें तो तरह-तरह के इल्ज़ाम लगाए,
50- इमाम को हर तरह से परेशान करने वाली क़ौम अपनी सुकून की तलाश करती है। ये मुमकिन नहीं कि ख़ुदा का फ़रमान, नबी का पैग़ाम, क़ुरआन पढ़ने/पढ़ाने वाले व ख़ुदा का जिक्र करने वालों को परेशान करके हम सुकून में रहें। ख़ुदा हम सबको हिदायत अता फरमाए।
