एक मदरसा का ऐसा किरदार, लग गई तरावीह वालें हाफिज़ों की अम्बार

रज़ा हुसैन क़ादरी

कुशीनगर: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में तमकुही रोड में स्थित मदरसा दारुल अशाअत के इतिहास भी दीनी ख़िदमात से भरे पड़े हैं, मदरसा क़ायम के बाद से ही तालीम व तरबियत पर मेहनत होती रही है। लेकिन दौरे हाज़िर में लगभग सन् 2002 के क़रीब हज़रत हाफ़िज़ व क़ारी जिकरुल्लाह साहब जब मदरसा में दर्से हिफ्ज़ के लिए आए तब से और ज्यादा तालीम व तरबियत पर मेहनत व मशक्कत शुरू की गई।

उस्ताज़ुल हुफ्फाज हज़रत ह़ाफ़िज़ व क़ारी जिकरुल्लाह साहब (तरावीह के बाद की तस्वीर)

कुछ सालों के बाद ही नतीजा निकलना शुरू हुआ जो एक नशिस्त (बैठक) में पूरा क़ुरआन पाक सुनाने के बाद फराग़त होना शुरू हुई जिनकी तादाद दो दर्जन के करीब तक है, और अभी भी दारुल अशाअ़त के फारिग़ीन हर जगह दीनी ख़िदमात को अंजाम देते व तरावीह सुनाने में कामयाब होते नज़र आ रहे हैं। तरावीह सुनाने वाले फारिग़ीन की कुछ तस्वीरें नीचे दी जा रही है।

नक़ीबे अहले सुन्नत हाफ़िज़ व क़ारी ग़ुलाम मुर्तज़ा शम्सी

रमज़ान का मुबारक महीना जारी है और पूरी दुनिया में मुसलमान ज्यादा इबादत कर अपने रब को राज़ी करने में जुटे हैं , ये वो मुबारक महीना है जिसमें इबादतों का सवाब आम महीनों से 70 गुना ज़्यादा मिलता है, फर्ज का सवाब 70 गुना ज्यादा तो वहीं सुनन व नफ्ल का सवाब फ़र्ज़ के मानिंद करार दिया गया है।

हाफ़िज़ व क़ारी मौलाना अबू तालिब मिस्बाही
हाफ़िज़ मेराज अहमद
हाफ़िज़ समीर रज़ा

लेकिन रोज़ा का सवाब खुदा और बंदे के बीच पर्दा है जो आखिरत में मिलेगा, इसमें ये भी कौ़ल है कि जो खाने – पीने के अलावा भी जितना ही सबर, परहेज, तक़वा इख्तियार करेगा वो उतना ही ज्यादा सवाब का हक़दार होगा।

हाफ़िज़ शाकिर रज़ा
हाफ़िज़ दानिश रज़ा

यही वजह है कि रमज़ान में ज्यादा से ज्यादा नमाज़, रोज़ा, इफ्तार, ज़कात, सदक़ए फितर वग़ैरह अदा किया जाता है ताकि हमारे अंदर सबर/परहेज भी आए और ख़ुदा हमसे राज़ी भी हो जाए।

हाफ़िज़ रज़ा हुसैन
हाफ़िज़ तौक़ीर रज़ा
हाफ़िज़ बेलाल रज़ा
हाफ़िज़ इमामुद्दीन अली
हाफ़िज़ दानिश रज़ा
हाफ़िज़ मासूम रज़ा पुत्र क़ारी ज़िकरुल्लाह साहब
हाफ़िज़ लुकमान रज़ा
हाफ़िज़ अब्दुर्रह़मान

नमाज़ में ख़ास इबादतों में शुमार तरावीह में कुर‌आन पढ़ना भी है, बड़ी दिलजोई के साथ मुसलमान तरावीह की शक्ल में कुर‌आन पाक सुनते या सुनाते हैं। इस्लाम में वैसे ही ओलमा / अइम्मा का मक़ाम अवाम से ऊंचा है, मिसाली तौर पे आ़लिम को चांद तो अवाम को तारों के मानिंद तस्लीम किया गया है। ये सब इल्म दीन सीखने व सिखाने की बुनियाद पर अवाम को यहां तक लाया जाता है।  

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